रक़्स-ए-मोहब्बत
गुस्ताख दिल को इल्म है
रक़्स-ए-मोहब्बत का,
गिरफ्त-ए-दिल जानता है
किस्सा दीवानगी का,
रुख बदल डाला
बेमुरव्वत तेरे मिज़ाज ने,
मेरी धडकनों से होकर आगाह
एक नज़र तो डाल,
बेइंतेहा इश्क़ के नजराने पर
हूँ मुसाफिर मैं तेरे
कारोबार-ए-ज़िन्दगी का
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